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Supaul: आश्विन की भोर में महका Harsingar, नवरात्र में बढ़ा धार्मिक व लोक महत्व
Supaul: Harsingar :आश्विन मास के आगमन के साथ ही कोसी क्षेत्र की सुबह एक अनोखे प्राकृतिक सम्मोहन से भर उठी है। शरद ऋतु की हल्की गुलाबी ठंडक, दूब पर चमकती ओस की बूंदें और दूर मंदिरों से गूंजती शंख-घंटियों के बीच चारों ओर खिलते मौसमी फूलों की भीनी महक शारदीय नवरात्र के पावन आगमन का संदेश दे रही है।
आश्विन की भोर में हरसिंगार (शिउली) और पारंपरिक माधुरी फूल धरती पर सुगंध और चटख रंगों का ऐसा उत्सव बिखेरते हैं, जो लोकजीवन और भक्ति परंपरा को सीधे प्रकृति से जोड़ देता है।
Supaul News: डाली से नहीं, जमीन से चुने जाते हैं Harsingar पुष्प
हरसिंगार (नाइट-फ्लावरिंग जैस्मिन) की सबसे अनूठी और विस्मयकारी विशेषता यह है कि यह दिन के उजाले में नहीं, बल्कि रात के नीरव सन्नाटे में चुपचाप अपनी पंखुड़ियां खोलता है। रात भर वातावरण में मादक सुगंध फैलाने के बाद भोर की पहली किरण फूटते ही यह स्वतः टहनी से टूटकर जमीन पर झर जाता है।
सनातन पूजा पद्धति में सामान्य नियम है कि देव-अर्चना के लिए पेड़ों से ताजे फूल तोड़े जाते हैं और जमीन पर गिरे फूलों को पूजा के योग्य नहीं माना जाता। परंतु, हरसिंगार इस नियम का अकेला और पावन अपवाद है। सुबह-सुबह गांवों और कस्बों में महिलाएं व नन्हे बच्चे पेड़ों के नीचे बिछी सफेद-केसरिया चादर से गिरे हुए ताजे फूलों को आदरपूर्वक चुनकर अपनी पूजा की थाली में सजाते हैं। धार्मिक ग्रंथों में इसे ‘स्वर्ग से धरती पर उतरा पारिजात’ कहा गया है, जो मां भगवती दुर्गा के पूजन में विशेष रूप से अर्पित किया जाता है।
दीये जैसी बनावट वाले माधुरी फूलों से मां की आराधना
हरसिंगार की खुशबूदार बहार के साथ ही आश्विन के इस मौसम में देहाती आंगनों की रौनक माधुरी फूल भी बढ़ाते हैं। सिंदूरी-लाल रंग और केंद्र में सुनहरे-पीले परागकणों से सजे इस फूल की सबसे बड़ी खूबी इसकी दीप जैसी बनावट है। हालांकि माधुरी पुष्प में हरसिंगार की तरह तीव्र गंध नहीं होती, लेकिन इसकी दीपशिखा सदृश अनूठी संरचना इसे अद्भुत दृश्य सौंदर्य देती है। मान्यता है कि यह लाल रंग पुष्प मां दुर्गा को अतिप्रिय है। यह फूल भी रात के पहर में खिलकर प्रातःकाल धरती पर गिर जाता है, मानो मां के चरणों में दीप प्रज्वलित कर नमन कर रहा हो।
लोकसंस्कृति, पीढ़ियों की स्मृतियां और संरक्षण की चुनौती
बिहार, बंगाल, असम और झारखंड सहित पूरे पूर्वी भारत में शिउली और पारिजात की खुशबू पीढ़ियों से दुर्गापूजा और शरद उत्सव की स्मृतियों का अटूट हिस्सा रही है। यह महज एक फूल नहीं, बल्कि त्योहारों के उल्लास और बालमन की स्मृतियों की धरोहर है।
हालांकि, आधुनिक दौर में अनियोजित निर्माण और तेजी से घटती हरियाली के कारण पारंपरिक हरसिंगार और माधुरी के पेड़ आंगनों से गायब हो रहे हैं। पर्यावरण प्रेमियों और वरिष्ठ नागरिकों का मानना है कि इस सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत को सहेजने के लिए विद्यालयों, सार्वजनिक पार्कों, देवालयों और आवासीय परिसरों में पारिजात के पौधों का सघन रोपण किया जाना चाहिए, जिससे आने वाली पीढ़ियां भी आश्विन की इन महकती भोरों का सान्निध्य पा सकें।
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