Bihar
Muharram Mela: मुहर्रम और आशूरा का इतिहास, सिर्फ कर्बला ही नहीं, कई ऐतिहासिक घटनाओं का गवाह है यह दिन
Muharram Mela: मुहर्रम का महीना आते ही ज़हन में हज़रत इमाम हुसैन और कर्बला के शहीदों की याद ताज़ा हो जाती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस्लामी इतिहास में मुहर्रम की 10वीं तारीख, यानी ‘यौमे आशूरा’ का महत्व सिर्फ कर्बला तक ही सीमित नहीं है? इस्लामी परंपराओं और मान्यताओं के अनुसार, इस पवित्र दिन का संबंध कई अन्य नबियों (पैगंबरों) के दौर की महान घटनाओं से भी है।
आशूरा से जुड़ीं प्राचीन धार्मिक मान्यताएं: Muharram Mela
स्थानीय उलेमा और इस्लामी इतिहासकारों के मुताबिक, आशूरा के दिन मानव इतिहास की कई बड़ी और महत्वपूर्ण घटनाएं घटी हैं। मान्यताओं के अनुसार इसी दिन:
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हज़रत आदम की तौबा कुबूल हुई थी।
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हज़रत नूह की कश्ती (नाव) महाप्रलय के बाद सुरक्षित किनारे लगी थी।
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हज़रत इब्राहीम आग के दहकते अंगारों से सही-सलामत बाहर आए थे।
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हज़रत मूसा और बनी इसराइल को अत्याचारी फिरऔन के ज़ुल्म से मुक्ति मिली थी।
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हज़रत यूनुस को मछली के पेट से सुरक्षित बाहर आने का रास्ता मिला था।
इन्हीं ऐतिहासिक घटनाओं के सिलसिले के बीच, इसी तारीख को कर्बला के मैदान में हज़रत इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों ने हक़ और इंसाफ़ के लिए अपनी जान का नज़राना पेश किया था। यही वजह है कि मुहर्रम केवल शोक का नहीं, बल्कि सब्र, त्याग, सच्चाई और न्याय का संदेश देता है।
भारत में ताजियादारी का इतिहास और बदलते स्वरूप: Muharram Mela
भारत में ताजियादारी (ताजिया निकालने) की परंपरा को लेकर इतिहासकारों के अलग-अलग मत हैं। कई जानकार इसकी शुरुआत को भारत में तैमूरलंग के शासनकाल से जोड़कर देखते हैं, हालांकि इस पर पूरी तरह एकमत राय नहीं है।
दरभंगा का अलीनगर, 250 साल पुरानी ताजियादारी की विरासत: Muharram Mela
बिहार के दरभंगा जिले के अलीनगर इलाके में ताजियादारी का इतिहास करीब ढाई सौ साल पुराना है। वक्त के साथ ताजियादारी के तौर-तरीकों में काफी बदलाव आया है। आज भी कई जगहों पर बेहद अदब के साथ मजलिस, फातिहा और कुरआनख्वानी (कुरआन का पाठ) जैसी धार्मिक रीतियां निभाई जाती हैं, जबकि कुछ क्षेत्रों में इसके आधुनिक स्वरूप को लेकर वैचारिक मतभेद भी देखे जाते हैं।
जमींदार परिवार का योगदान: Muharram Mela
स्थानीय इतिहास के अनुसार, इस परंपरा को मजबूती तब मिली जब तत्कालीन जमींदार परिवार की महिला हसीनतुन निशां ने इमामबाड़े और मजलिसखाने का निर्माण करवाया और इसके रखरखाव के लिए जमीन दान में दी। इसके बाद अलीनगर और उसके आसपास के ग्रामीण इलाकों में बड़े पैमाने पर ताजिया बनाने की शुरुआत हुई।
श्यामपुर की बेजोड़ नक्काशी: Muharram Mela
अलीनगर के पास स्थित श्यामपुर गांव का ताजिया अपनी बेहतरीन कलात्मक बनावट और खूबसूरत लकड़ी की नक्काशी के लिए दूर-दूर तक मशहूर रहा है। हालांकि, बदलते वक्त और आधुनिकता के दौर में कई गांवों से यह पारंपरिक रिवाज अब धीरे-धीरे कम या समाप्त होता जा रहा है।
प्रशासनिक फैसला, इस बार अलीनगर में नहीं सजेगा मुहर्रम मेला
अलीनगर के हाट मैदान में हर साल मुहर्रम के मौके पर विभिन्न गांवों से आने वाले ताजियों का मिलान (मिलन) होता है, जिसे देखने भारी भीड़ उमड़ती है। इस दौरान यहां बड़ा मेला, झूला और मीना बाजार भी लगाया जाता रहा है। लेकिन इस वर्ष, स्थानीय प्रशासन ने कानून और सुरक्षा व्यवस्था (विधि-व्यवस्था) को ध्यान में रखते हुए बड़ा फैसला लिया है:
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इस बार मीना बाजार, झूला और अस्थायी दुकानों को लगाने की अनुमति नहीं दी गई है।
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ताजियों का पारंपरिक मिलान शांतिपूर्ण ढंग से होगा, लेकिन पूर्व की तरह भव्य मेले का आयोजन नहीं किया जाएगा।