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Madhepura News: मधेपुरा में हरी मिर्च की खेती, मुनाफे की मिठास अब बनी घाटे की कड़वाहट

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Madhepura News: बिहार के मधेपुरा जिले का बिहारीगंज प्रखंड कभी हरी मिर्च की बेहतरीन पैदावार और उससे होने वाली अच्छी कमाई के लिए जाना जाता था। लेकिन इस वर्ष स्थिति बिल्कुल उलट है। खेतों में मिर्च की फसल तो भरपूर है, लेकिन बाजारों में उसका सही दाम न मिलने से किसानों के चेहरों की रंगत उड़ गई है। लागत निकालना भी एक बड़ी चुनौती बन चुका है।

अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक थी धाक, अब खरीदारों का टोटा: Madhepura News

बिहारीगंज इलाके में होने वाली हरी मिर्च की मांग केवल स्थानीय बाजारों तक सीमित नहीं थी। यहाँ की मिर्च पड़ोसी देशों जैसे नेपाल, भूटान और बांग्लादेश तक निर्यात की जाती थी। इसके अलावा देश के भीतर पश्चिम बंगाल, झारखंड और उत्तर प्रदेश के बड़े शहरों में भी यहाँ की मिर्च की भारी मांग रहती थी। व्यापारी खुद गांवों में आकर फसल खरीदते थे, जिससे किसानों को मंडी भटकना नहीं पड़ता था।

इस साल क्यों डूबी किसानों की लागत?: Madhepura News

किसानों के अनुसार, इस साल घाटा होने के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

निर्यात में आई बाधाएं: इस बार विदेशों और अन्य राज्यों में मिर्च भेजने (एक्सपोर्ट) में काफी कठिनाइयाँ आ रही हैं, जिससे स्थानीय स्तर पर मिर्च का स्टॉक जमा हो गया है।

लागत में भारी बढ़ोतरी: बीज, खाद, कीटनाशक और मजदूरों की मजदूरी (श्रम लागत) पहले के मुकाबले काफी बढ़ चुकी है।

कौड़ियों के दाम बिक रही फसल: जहाँ पहले मिर्च के अच्छे दाम मिलते थे, वहीं इस सीजन में किसानों को मजबूरी में 1200 रुपये से 2000 रुपये प्रति क्विंटल के बेहद कम दाम पर मिर्च बेचनी पड़ रही है।

किसानों की मांग, हरी मिर्च पर भी मिले MSP

दिलीप मंडल, नीरज मेहता, संजय यादव, मु. फारूक और भरत मंडल जैसे दर्जनों स्थानीय किसानों का कहना है कि सरकार को पारंपरिक फसलों की तरह हरी मिर्च जैसी नकदी फसलों पर भी न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) लागू करना चाहिए। किसानों को डर है कि अगर सरकार ने जल्द ही कोई ठोस कदम नहीं उठाया या निर्यात के रास्ते आसान नहीं किए, तो वे कर्ज के दलदल में फंस जाएंगे। हालांकि, इन तमाम मुश्किलों के बाद भी किसानों की आंखों में आने वाले दिनों में कीमतों में सुधार की एक उम्मीद बाकी है।

 

 

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